531 स्कूलों के शिक्षक बेहाल, उत्तराखंड में व्यावसायिक शिक्षा पर संकट के बादल
उत्तराखंड के विभिन्न राजकीय विद्यालयों में कार्यरत व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) से जुड़े शिक्षक इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। अप्रैल 2025 की सैलरी 22 मई तक भी जारी नहीं हुई है, जिससे सैकड़ों शिक्षकों की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है।
यह शिक्षक उत्तराखंड वोकेशनल ट्रेनिंग प्रोग्राम के अंतर्गत कार्यरत हैं और इनकी नियुक्ति वोकेशनल ट्रेनिंग प्रोवाइडर कंपनी 'विज़न इंडिया सर्विस प्राइवेट लिमिटेड' के माध्यम से की गई है। वर्ष 2020 से प्रदेश में यह योजना संचालित हो रही है, जिसके तहत राज्य के 531 विद्यालयों में आठ अलग-अलग ट्रेड्स – आईटी/आईटीईएस, रिटेल, ऑटोमोबाइल, हेल्थकेयर, टूरिज्म, एग्रीकल्चर, इलेक्ट्रॉनिक्स व ब्यूटी एंड वेलनेस – में व्यावसायिक शिक्षा दी जा रही है।
शिक्षकों की स्थिति बेहद खराब
शिक्षकों का कहना है कि उनकी पहले से ही बहुत कम सैलरी है, और अब समय पर भुगतान न होने से उनके सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है। कुछ शिक्षकों के पास स्कूल तक आने-जाने के भी पैसे नहीं हैं, तो कुछ ने मजबूरी में पर्सनल लीव लेकर छुट्टी ले ली है।
कंपनी के अधिकारी नहीं दे रहे स्पष्ट जवाब
शिक्षकों के अनुसार, जब सैलरी में हो रही देरी को लेकर वे विज़न इंडिया सर्विस प्राइवेट लिमिटेड के अधिकारियों से संपर्क करते हैं, तो कोई ठोस या स्पष्ट जवाब नहीं मिलता। अधिकारी गोलमोल बातें कर मामले को टाल रहे हैं, जिससे शिक्षकों में और अधिक असंतोष फैल रहा है।
व्यावसायिक शिक्षा का उद्देश्य और महत्व
व्यावसायिक शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को रोजगारोन्मुखी कौशल प्रदान करना है ताकि वे भविष्य में नौकरी या स्वरोजगार के लिए तैयार हो सकें। यह शिक्षा प्रणाली युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने और प्रदेश में स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने का एक सशक्त माध्यम है।
सरकार से मांग
शिक्षकों ने सरकार और संबंधित विभागों से मांग की है कि वे इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करें और ट्रेनिंग प्रोवाइडर कंपनी को निर्देश दें कि शिक्षकों को समय पर सैलरी दी जाए, ताकि वे मानसिक और आर्थिक रूप से राहत महसूस कर सकें और छात्रों की पढ़ाई भी बाधित न हो।
व्यावसायिक शिक्षक राज्य की शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्हें उचित सम्मान और समय पर भुगतान मिलना बेहद जरूरी है, अन्यथा इसका प्रभाव न केवल शिक्षकों पर, बल्कि स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा।


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