ओखलकांडा दसवीं में एक छात्र, सात शिक्षक और फिर भी सभी विषयों में फेल
नैनीताल। शिक्षा को लेकर चाहे जितने भी दावे किए जाएं, लेकिन उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की हकीकत किसी चौंकाने वाले सच से कम नहीं है। नैनीताल जनपद के ओखलकांडा ब्लॉक में स्थित एक राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ने इस बार उत्तराखंड बोर्ड परीक्षा में एक अनोखा, मगर निराशाजनक रिकॉर्ड बना दिया है। इस स्कूल में हाईस्कूल का सिर्फ एक छात्र परीक्षा में बैठा और वह भी सभी विषयों में फेल हो गया। हैरानी की बात यह है कि इस स्कूल में कुल सात शिक्षक तैनात हैं।
सात छात्र, सात शिक्षक
शिक्षा सत्र 2023-24 में इस स्कूल में कक्षा छह से दसवीं तक केवल सात छात्र पढ़ते थे। कक्षा छह और सात में दो-दो छात्र, जबकि आठवीं, नौवीं और दसवीं में एक-एक छात्र नामांकित था। बावजूद इसके, इस स्कूल में एक प्रधानाध्यापक समेत कुल सात शिक्षक तैनात रहे। यानि एक तरह से देखा जाए तो हर छात्र पर एक शिक्षक था, फिर भी पढ़ाई का स्तर कैसा रहा, इसका अंदाजा परीक्षा परिणाम से साफ लगाया जा सकता है।
शून्य प्रतिशत रहा हाईस्कूल का रिजल्ट
उत्तराखंड बोर्ड परीक्षा 2024 के नतीजे 19 अप्रैल को घोषित किए गए। इस स्कूल का हाईस्कूल का एकमात्र छात्र जब परीक्षा में बैठा तो सभी की निगाहें उस पर थीं, लेकिन परिणाम आया तो सब निराश रह गए। छात्र सभी विषयों में फेल हो गया। उसे सबसे अधिक अंक हिन्दी में मात्र 10 मिले, अन्य विषयों में स्थिति और भी खराब रही।
शिक्षकों ने पढ़ाने का दावा किया, विभाग ने मांगा जवाब
स्कूल के प्रभारी प्रधानाध्यापक का कहना है कि छात्र को नियमित रूप से कक्षा में पढ़ाया गया। उन्होंने यह भी बताया कि एक शिक्षक (कला विषय) को दूसरे स्कूल में व्यवस्था के तहत भेजा गया था, बाकी शिक्षक उपस्थित रहते थे। दूसरी ओर, बीईओ ओखलकांडा सुलोहिता नेगी ने बताया कि इस प्रकरण की जांच की जा रही है और सभी संबंधित शिक्षकों से स्पष्टीकरण मांगा गया है।
एडी कुमाऊं ने जताई नाराजगी
कुमाऊं मंडल के अपर निदेशक (शिक्षा) गजेन्द्र सिंह सौन ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि पूरे स्कूल का परिणाम शून्य प्रतिशत आना चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि विभागीय जांच की जा रही है और नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी। इस तरह के मामलों से शिक्षा व्यवस्था की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
क्या कहती है ये स्थिति?
यह मामला केवल एक स्कूल का नहीं है, बल्कि यह राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर करता है। जहां एक ओर शिक्षकों की भारी तैनाती है, वहीं दूसरी ओर बच्चों की संख्या नगण्य है और जो बच्चे हैं, वे भी पढ़ाई में पिछड़े हुए हैं। यह स्थिति शिक्षा विभाग की योजनाओं, निगरानी और क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करती है।
जरूरत है जवाबदेही की
अब समय आ गया है जब केवल आंकड़ों से संतुष्ट रहने की बजाय शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए। शिक्षकों की जवाबदेही तय हो, बच्चों की वास्तविक प्रगति की मॉनिटरिंग हो और शिक्षा विभाग केवल औपचारिकता निभाने की बजाय ज़मीनी सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए। नहीं तो ऐसी घटनाएं उत्तराखंड की शिक्षा को शर्मसार करती रहेंगी।



Koun sa school h gaon ka name bataye
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