"उत्तराखंड में व्यावसायिक शिक्षकों से HR की बदतमीज़ी – 'नौकरी चाहिए तो चुप रहो, नहीं तो छोड़ दो'"
देहरादून
उत्तराखंड की व्यावसायिक शिक्षा प्रणाली इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। प्रदेश के विभिन्न राजकीय माध्यमिक विद्यालयो में कार्यरत सैकड़ों वोकेशनल शिक्षक (Vocational Trainers) पिछले दो महीनों से वेतन न मिलने के कारण मानसिक और आर्थिक तनाव झेल रहे हैं। यह स्थिति न केवल इन शिक्षकों के लिए संकट का कारण बनी है, बल्कि छात्रों की पढ़ाई और भविष्य पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है।
वर्तमान में राज्य में व्यावसायिक शिक्षा का संचालन राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (NSQF) के अंतर्गत निजी कंपनियों के माध्यम से किया जा रहा है। इन्हीं में से एक कंपनी विजन इंडिया सर्विस प्राइवेट लिमिटेड पर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि जब कुछ वोकेशनल ट्रेनर्स ने कंपनी के एचआर विभाग से वेतन में हो रही देरी को लेकर बात की, तो उन्हें असंवेदनशील जवाब मिला — "जॉब छोड़ दो।"
वेतन न मिलने से बढ़ी आर्थिक परेशानी
राज्य के कई जिलों — जैसे ऊधम सिंह नगर, नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और पौड़ी — में कार्यरत वोकेशनल ट्रेनर अपनी शिकायत लेकर अब प्रशासन और सरकार के दरवाजे खटखटा रहे हैं। अधिकांश ट्रेनरों का कहना है कि वे बीते दो महीनों से बिना वेतन के काम कर रहे हैं। उनके घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जिम्मेदारियों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है।
कई ट्रेनरों ने सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई है, वहीं कुछ ने श्रम विभाग और लेबर कोर्ट से भी न्याय की गुहार लगाई है। बावजूद इसके, अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है।
छात्रों की पढ़ाई पर असर, भविष्य अधर में
इन प्रशिक्षकों के अनुसार, व्यावसायिक शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत 9वीं से 12वीं कक्षा तक के छात्रों को विभिन्न ट्रेड्स — जैसे आईटी, रिटेल, हेल्थकेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल आदि — में व्यावहारिक और तकनीकी शिक्षा दी जाती है। लेकिन ट्रेनरों की नाराजगी और आर्थिक असंतोष के चलते कक्षाओं पर सीधा असर पड़ रहा है। कई जगहों पर कक्षाएं स्थगित करनी पड़ी हैं तो कहीं शिक्षक मजबूरी में काम कर रहे हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
कंपनियों की जवाबदेही तय करने की मांग
वोकेशनल ट्रेनर लगातार यह मांग कर रहे हैं कि सरकार ऐसी निजी कंपनियों पर कठोर कार्रवाई करे जो समय पर वेतन नहीं दे रही हैं और शिक्षा व्यवस्था को अस्थिर कर रही हैं। शिक्षक संगठनों का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा इस योजना के लिए नियमित फंड भेजा जाता है, ऐसे में राज्य सरकार और संबंधित कंपनियों को जवाब देना चाहिए कि आखिर भुगतान में देरी क्यों हो रही है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और संगठनों ने जताई चिंता
वोकेशनल शिक्षकों की इस समस्या को अब सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने भी गंभीरता से लिया है। कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर चिंता जताई है और सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि यदि यही स्थिति रही, तो राज्य के युवाओं को कौशल आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाएगी और वे रोजगार की दौड़ में पीछे रह जाएंगे।
सरकार को चाहिए सख्त कदम
यह एक चिंताजनक स्थिति है कि जिन शिक्षकों के कंधों पर छात्रों के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी है, वे खुद अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। राज्य सरकार को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप कर न केवल बकाया वेतन का भुगतान सुनिश्चित करना चाहिए, बल्कि ऐसी एजेंसियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए जो शिक्षा के क्षेत्र में लापरवाही बरत रही हैं।
अगर यही हाल रहा तो न केवल उत्तराखंड के सैकड़ों प्रशिक्षक आर्थिक संकट में घिरेंगे, बल्कि राज्य की व्यावसायिक शिक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आ जाएगी। जरूरत है पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता की — ताकि शिक्षक भी सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें और छात्र भी भविष्य की तैयारी आत्मविश्वास के साथ कर सकें।


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