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मोदी सरकार का बड़ा फैसला: देश में होगी जातिगत जनगणना, कैबिनेट ने दी मंजूरी

नई दिल्ली: केंद्र की मोदी सरकार ने देश में जातिगत जनगणना कराने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया। इस फैसले के तहत आगामी जनगणना में नागरिकों की जाति से जुड़ी जानकारी भी एकत्र की जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे सामाजिक योजनाओं और विकास नीतियों को ज्यादा सटीक तरीके से तैयार करने में मदद मिलेगी।

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दी जानकारी

बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा कि सरकार अब जातिगत आंकड़ों को भी जनगणना में शामिल करेगी। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस ने दशकों तक जातियों का केवल राजनीतिक लाभ उठाया और वास्तविक सामाजिक न्याय के लिए कोई ठोस काम नहीं किया।

अश्विनी वैष्णव ने कहा, "विपक्ष जातिगत जनगणना की मांग कर रहा था, लेकिन जब उन्हें अवसर मिला तब उन्होंने कभी इसे गंभीरता से नहीं लिया। अब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया है, जिससे देश के सभी वर्गों को बराबरी का लाभ मिल सकेगा।"

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विपक्ष की लंबे समय से थी मांग

देश के कई राजनीतिक दल लंबे समय से जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे। खासकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, झारखंड और तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। कांग्रेस समेत कई दलों ने भी संसद में यह मांग उठाई थी कि केंद्र सरकार जातिगत आधार पर आंकड़े इकट्ठा करे ताकि सामाजिक न्याय की दिशा में ठोस नीतियां बनाई जा सकें।

क्या है जातिगत जनगणना?

जातिगत जनगणना का मतलब है कि देश के नागरिकों से उनकी जाति की जानकारी एकत्र की जाए। भारत में 1931 में आखिरी बार जातियों की जनगणना हुई थी। उसके बाद अब तक जनगणना केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए ही की जाती रही है। ओबीसी (OBC) और अन्य जातियों की गणना नहीं होती थी।

जातिगत जनगणना से यह पता चल सकेगा कि देश में कौन-कौन सी जातियां हैं, उनकी आबादी कितनी है और वे सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से किस स्थिति में हैं। इससे नीतियों के निर्माण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जा सकेगा।

सरकार का उद्देश्य और लाभ

सरकार का मानना है कि जातिगत जनगणना से योजनाओं को अधिक प्रभावी और लक्षित बनाया जा सकेगा। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि जो वर्ग वंचित हैं, उन्हें सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ मिल सके। यह जानकारी सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए भी उपयोगी होगी।

इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार जैसे क्षेत्रों में योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकेगा। इसके अलावा, यह आंकड़े समाज में समानता और समरसता को बढ़ावा देने वाली नीतियों के लिए आधार बन सकते हैं।

राजनीतिक मायने और चुनौतियाँ

हालांकि सरकार के इस फैसले को लेकर राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। जहां एक ओर विपक्ष इस फैसले का स्वागत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ वर्गों ने यह चिंता भी जाहिर की है कि जातिगत आंकड़ों का दुरुपयोग हो सकता है।

इसके अलावा, विशेषज्ञों का मानना है कि जातिगत जनगणना एक संवेदनशील विषय है और इसे पूरी पारदर्शिता, सावधानी और निष्पक्षता के साथ किया जाना चाहिए। आंकड़ों की विश्वसनीयता और गोपनीयता सुनिश्चित करना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

2026 तक हो सकती है अगली जनगणना

कोविड-19 महामारी के चलते 2021 में होने वाली जनगणना पहले ही टल चुकी है। अब उम्मीद की जा रही है कि अगली जनगणना 2026 तक आयोजित की जा सकती है। ऐसे में यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि जातिगत जनगणना को इसी जनगणना के साथ जोड़ा जाएगा।

निष्कर्ष

मोदी सरकार का यह फैसला निश्चित ही एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक बदलाव लाने वाला कदम है। इससे देश में सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में नया मार्ग खुलेगा। हालांकि इसे सफल बनाने के लिए जरूरी है कि सरकार पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ इसे अंजाम दे। आने वाले समय में इसके राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक प्रभावों को नजदीकी से देखा जाएगा।



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