"सेवा पुस्तिका ढूंढेगा मंदिर? अधिकारी मांग रहे हैं दो मुट्ठी चावल"
लोहाघाट, चंपावत | 16 मई 2025
उत्तराखंड के चंपावत जनपद अंतर्गत लोहाघाट स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग खण्ड (लोक निर्माण विभाग) से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी कार्यालयों में कामकाज की पारदर्शिता और प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग में कार्यरत अपर सहायक अभियन्ता इं. जय प्रकाश की सेवा पुस्तिका विभागीय अलमारी से रहस्यमयी ढंग से गुम हो गई है।
काफी खोजबीन के बावजूद जब दस्तावेज़ नहीं मिला, तो अधिशासी अभियन्ता श्री आशुतोष कुमार द्वारा एक कार्यालय आदेश जारी किया गया, जिसमें कहा गया है कि सभी कर्मचारी 17 मई को अपने घरों से दो मुट्ठी चावल लाकर कार्यालय में दें। ये चावल किसी मंदिर में अर्पित किए जाएंगे, ताकि "दैवीय आस्था" से समाधान निकाला जा सके।
क्या कहता है आदेश?
कार्यालय पत्रांक 836/150 दिनांक 16.05.2025 में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि सेवा पुस्तिका न मिलने के कारण संबंधित अधिकारी मानसिक रूप से परेशान हैं। ऐसे में आस्था के आधार पर समाधान खोजने का प्रयास किया जा रहा है।
सवाल खड़े होते हैं...
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क्या आस्था के सहारे सरकारी कामकाज चलाना उचित है?
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क्या यह मामला किसी प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम नहीं है?
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महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों की सुरक्षा प्रणाली पर विश्वास कैसे कायम रहेगा, जब मंदिर में चावल चढ़ाकर समाधान की अपेक्षा की जा रही है?
विशेषज्ञों की राय
विभिन्न प्रशासनिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मामला लापरवाही की जांच का है। सेवा पुस्तिका जैसे दस्तावेज़ की गुमशुदगी पर संबंधित कर्मचारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए, न कि धार्मिक उपायों पर भरोसा करके मामला शांत किया जाए।
निष्कर्ष:
इस प्रकार के घटनाक्रम यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि जब सरकारी तंत्र में प्रक्रियाओं की जगह आस्था को तरजीह दी जाती है, तो जवाबदेही और पारदर्शिता कैसे कायम रह पाएगी? क्या ऐसे मामलों में सख्त जांच और दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए या फिर धार्मिक विश्वास के भरोसे सरकारी दस्तावेज़ खोजे जाएंगे?

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