नैनीताल दुष्कर्म मामला: हाईकोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई पर लगाई रोक
नैनीताल।
नैनीताल में 12 वर्षीय नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपी ठेकेदार मो. उस्मान को उत्तराखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने नगर पालिका द्वारा आरोपी के घर पर चलाए जा रहे ध्वस्तीकरण अभियान पर नाराजगी जाहिर करते हुए कार्रवाई पर रोक लगाई है। कोर्ट की सख्ती के बाद नगर पालिका ने अपना नोटिस वापस ले लिया है, जबकि राज्य सरकार से भी पूरे प्रकरण का रिकार्ड तलब किया गया है।
शुक्रवार को उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ में इस मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश कानून नहीं हैं या वे उत्तराखंड पर लागू नहीं होते? कोर्ट ने नगर पालिका द्वारा जारी नोटिस की वैधता पर सवाल उठाते हुए एसएसपी नैनीताल और अधिशासी अधिकारी से पूरी प्रक्रिया की जानकारी मांगी।
यह मामला तब सामने आया जब आरोपी की पत्नी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर नगर पालिका के नोटिस को चुनौती दी। याचिका में कहा गया कि 1 मई 2025 को उनके घर को गिराने का नोटिस चस्पा किया गया, जब घर पर कोई भी मौजूद नहीं था। अधिवक्ता कार्तिकेय हरि गुप्ता ने अदालत को बताया कि पीड़िता एक वरिष्ठ महिला नागरिक हैं जो पिछले तीन दिनों से अपने ही घर में प्रवेश नहीं कर पाई हैं। उन्होंने दावा किया कि यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है, जिसमें बिना उचित प्रक्रिया के बुलडोजर कार्रवाई पर रोक लगाई गई है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने हल्द्वानी में आरोपी को पेश किए जाने के बाद वकीलों द्वारा किए गए विरोध और हिंसक व्यवहार पर भी नाराजगी जताई। न्यायालय ने पूछा कि आखिर वकील किसी आरोपी को कानूनी सहायता देने से कैसे रोक सकते हैं? कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस सतर्क होती तो आरोपी पर हमला नहीं होता।
अदालत ने गाड़ी पड़ाव क्षेत्र में दुकानों की तोड़फोड़ का भी संज्ञान लिया और पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि पुलिस की मौजूदगी में भीड़ कैसे दुकानों को नुकसान पहुंचा सकती है? अदालत ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का कर्तव्य है, लेकिन यहां पुलिस मूकदर्शक बनी रही।
इस मामले में याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी बताया कि भीड़ उनके घर को जलाने की कोशिश कर रही है और उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता है। कोर्ट ने जब यह पूछा कि नोटिस पर किसके हस्ताक्षर हैं, तो बताया गया कि इसे नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी ने हस्ताक्षरित किया है।
सरकारी वकील की ओर से जवाब में कहा गया कि ध्वस्तीकरण की कोई तत्काल कार्रवाई नहीं की गई है, केवल तीन दिन में जवाब देने को कहा गया था। साथ ही यह भी कहा गया कि नोटिस केवल आरोपी को नहीं, बल्कि अन्य लोगों को भी भेजे गए हैं।
हालांकि कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना की गई है, तो अवमानना की कार्यवाही भी हो सकती है। अदालत ने एसएसपी और अधिशासी अधिकारी से लिखित रूप से निर्देश प्रस्तुत करने को कहा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।
यह मामला अब केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं रहा, बल्कि इसमें प्रशासनिक कार्यवाही और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का भी पहलू जुड़ गया है। हाईकोर्ट की सख्ती से यह संदेश साफ है कि किसी भी संवेदनशील मामले में जल्दबाजी या कानून से इतर कोई भी कदम अदालत की नजर से नहीं बच सकता।

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