उत्तराखण्ड में कड़ा नियम: ₹5000 की खरीद भी बतानी होगी अफसर को
देहरादून, 14 जुलाई 2025
उत्तराखण्ड शासन द्वारा राज्य के समस्त सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण शासनादेश जारी किया गया है, जिसमें आचरण नियमावली 2002 के नियम-22 के अनुपालन को लेकर स्पष्ट और कड़े निर्देश दिए गए हैं। मुख्य सचिव श्री आनंद बर्द्धन द्वारा हस्ताक्षरित इस आदेश में राज्य के समस्त प्रमुख सचिवों, विभागाध्यक्षों, मण्डलायुक्तों, जिलाधिकारियों एवं प्रमुख कार्यालयाध्यक्षों को निर्देशित किया गया है कि वे अपने अधीनस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों से नियमों का सख्ती से पालन करवाएं।
चल-अचल संपत्ति से संबंधित हैं निर्देश
मुख्य बिंदु उत्तराखण्ड राज्य कर्मचारियों की आचरण नियमावली, 2002 के नियम-22 से जुड़ा है, जिसमें यह कहा गया है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी बिना समुचित प्राधिकारी की पूर्व जानकारी या स्वीकृति के कोई चल या अचल संपत्ति स्वयं, अपने नाम से या अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम से अर्जित या विक्रय नहीं कर सकता।
इस नियम में विशेष उल्लेख है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी किसी ख्यातिप्राप्त व्यापारी से कोई अचल संपत्ति का लेन-देन करता है, तो भी उसे पहले समुचित प्राधिकारी से अनुमति लेनी होगी। चल संपत्ति की बात करें तो यदि संपत्ति का मूल्य एक माह के वेतन अथवा ₹5,000 (जो भी कम हो) से अधिक है, तो भी उसकी जानकारी तत्काल प्राधिकारी को देनी अनिवार्य होगी।
हर पांच वर्ष में देनी होगी संपत्ति की घोषणा
प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को पहली नियुक्ति के समय और उसके बाद हर पांच वर्षों में एक बार अपनी अर्जित की गई चल एवं अचल संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य है। इस घोषणा में स्वयं की संपत्ति के साथ-साथ पत्नी, साथ में रहने वाले या आश्रित परिजनों द्वारा अर्जित की गई संपत्ति का भी पूर्ण विवरण देना होगा। इसमें स्रोत और साधनों की जानकारी भी देना अनिवार्य है।
आदेश का पालन न करने पर हो सकती है अनुशासनात्मक कार्यवाही
मुख्य सचिव ने स्पष्ट किया है कि जो अधिकारी-कर्मचारी इन निर्देशों की अवहेलना करेंगे, उनके विरुद्ध उत्तराखण्ड सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली के अंतर्गत अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है। शासन ने यह भी कहा है कि इस नियम के पालन से न केवल सरकारी प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा।
प्रशिक्षण संस्थानों और आयोगों को भी भेजी गई प्रतिलिपि
इस शासनादेश की प्रतिलिपि उत्तराखण्ड प्रशासन अकादमी, उच्च न्यायालय, लोक सेवा आयोग, अधीनस्थ सेवा चयन आयोग, चिकित्सा सेवा चयन बोर्ड एवं सूचना एवं लोक सम्पर्क निदेशालय सहित सभी महत्त्वपूर्ण संस्थाओं को भेजी गई है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि राज्य में कार्यरत प्रत्येक सरकारी कर्मचारी इस नियम से भलीभांति अवगत हो।
उत्तराखण्ड शासन का यह कदम राज्य में सुशासन, पारदर्शिता और ईमानदारी की दिशा में एक सशक्त प्रयास माना जा रहा है। इससे न केवल कर्मचारियों में उत्तरदायित्व की भावना बढ़ेगी बल्कि सार्वजनिक जीवन में सरकारी सेवकों के प्रति आमजन का विश्वास भी सुदृढ़ होगा। यह शासनादेश सरकारी तंत्र में अनुशासन और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम के रूप में देखा जा रहा है।




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