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फेसबुकिया फौज और व्हाट्सएप वॉरियर्स ,ग्राम सभा में वायरल नेताजी: रील चलाओ, वोट पाओ!

 उत्तराखंड,हल्द्वानी 

उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है, लेकिन इस बार चुनावी मैदान का नक्शा कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। अब नेताजी सिर्फ गांव की चौपाल या हाट बाजार में ही नजर नहीं आते, बल्कि इंस्टाग्राम रील, व्हाट्सएप स्टेटस और फेसबुक लाइव पर भी जमकर वोट मांगते दिखाई दे रहे हैं।

इस बार प्रचार का तरीका पारंपरिक कम और डिजिटल ज़्यादा हो गया है। गांव की गलियों से लेकर मोबाइल की स्क्रीन तक नेताजी का चेहरा चमक रहा है। पुराने जमाने की "पर्चा-पोस्टर" संस्कृति अब "रील-रिलेशनशिप" में बदल चुकी है। जहां पहले नेताजी लाउडस्पीकर से बोलते थे – "भाइयों और बहनों, वोट देना मत भूलना...", अब वो रील में बैकग्राउंड म्यूजिक पर मुस्कुराते हुए कह रहे हैं – "मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए ❤️ #VoteForMe #GramPradhan2025"

आश्चर्य की बात यह है कि रील और डिजिटल प्रचार में सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि अनुभवी और उम्रदराज़ प्रत्याशी भी पूरे जोश के साथ कूद पड़े हैं। 

सोशल मीडिया पर हर उम्मीदवार की एक "डिजिटल आर्मी" तैयार हो चुकी है। ये युवा समर्थक रात-दिन सोचते रहते हैं कि कौन-सी लाइन या मीम वायरल होगी, कौन-सा बैकग्राउंड म्यूजिक जनता के दिल में उतर जाएगा, और किस एंगल से नेताजी का चेहरा ज़्यादा करिश्माई लगेगा।

वहीं, एआई टूल्स का भी जबरदस्त इस्तेमाल हो रहा है। कुछ उम्मीदवारों ने अपने चुनावी वादों को "AI-generated पोस्टर" में ढाल कर पेश किया है। कोई कह रहा है – "हर घर में Wi-Fi दूंगा", तो कोई वादा कर रहा है – "नालियों में साउंडप्रूफ ढक्कन लगवाऊंगा, ताकि मच्छर भी साइलेंट हो जाएं।"

कुछ डिजिटल पोस्ट में तो नेताजी को प्रधानमंत्री के साथ फोटोशॉप में खड़ा दिखाया गया है, जैसे अगले ही दिन उन्हें मंत्रिमंडल में कोई जिम्मेदारी मिलने वाली हो।

लेकिन डिजिटल प्रचार की इस आंधी में एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है – क्या सोशल मीडिया की रीलें और पोस्टें, जमीन पर की गई मेहनत और जनसंपर्क का मुकाबला कर पाएंगी?

कई ग्रामीण मतदाता आज भी मोबाइल से अधिक महत्व चाय की दुकान और पंचायत चौपाल को देते हैं। उनका मानना है कि रील तो सब बना सकते हैं, पर असली काम तो वो ही करेगा जो मुश्किल समय में गांव में खड़ा मिलेगा, ना कि सिर्फ स्क्रीन पर मुस्कराता रहेगा।

एक बुजुर्ग मतदाता ने व्यंग्य करते हुए कहा – "इस बार तो नेताजी हमारे खेतों में काम करते नहीं दिखे, पर मोबाइल में रोज उनकी शक्ल देखने को मिल रही है।"

हालांकि युवा मतदाता इस डिजिटल क्रांति से काफी प्रभावित नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि सोशल मीडिया से कम से कम सभी उम्मीदवारों की जानकारी एक क्लिक में मिल रही है, और अब परदे के पीछे छिपे चेहरे भी सामने आने लगे हैं।

चुनाव प्रचार का यह डिजिटल रंग, आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इंटरनेट की स्पीड, सड़कों की हालत से ज्यादा असरदार साबित होगी या नहीं।

अब जबकि मतदान नजदीक है, जनता को तय करना है कि वो "रील वाले नेता" को वोट देगी या "रियल वाले काम करने वाले" को।



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