फिर टल सकते हैं ग्राम पंचायत चुनाव, प्रशासकों का कार्यकाल बढ़ेगा एक बार फिर
देहरादून
उत्तराखंड की 7000 से अधिक ग्राम पंचायतों में एक बार फिर से चुनाव टलने के संकेत मिल रहे हैं। राज्य में पंचायती राज व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए नियुक्त किए गए प्रशासकों का कार्यकाल इसी महीने समाप्त हो रहा है, लेकिन चुनाव न होने की स्थिति में अब इनका कार्यकाल फिर से बढ़ाया जाएगा। विभागीय सूत्रों की मानें तो केवल ग्राम पंचायत ही नहीं, बल्कि क्षेत्र और जिला पंचायतों में भी प्रशासकों की जिम्मेदारियां आगे बढ़ सकती हैं।
गौरतलब है कि राज्य के हरिद्वार जिले को छोड़कर बाकी सभी जिलों में ग्राम, क्षेत्र व जिला पंचायतों का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका है। ऐसे में इन सभी संस्थाओं में शासन द्वारा प्रशासकों की नियुक्ति की गई थी। खास बात यह है कि ग्राम पंचायतों में ज्यादातर स्थानों पर निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाया गया है।
विभागीय अधिकारियों के अनुसार इन प्रशासकों को छह महीने की अवधि के लिए नियुक्त किया गया था, जो अब मई माह में समाप्त हो रही है। परंतु अभी तक उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम (Panchayati Raj Act) में आवश्यक संशोधन नहीं हो पाया है। इसके चलते राज्य सरकार ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण को पंचायत चुनावों में लागू नहीं कर पाई है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार ओबीसी आरक्षण लागू करना अनिवार्य है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार अब भी तेजी से कार्य करे, तो भी आरक्षण प्रक्रिया में कम से कम 10 से 15 दिन का समय लगेगा। इसके बाद चुनाव कराने की न्यूनतम प्रक्रिया में 25 से 30 दिन और लगेंगे। इस तरह अगले एक से डेढ़ महीने तक चुनाव कराना संभव नहीं है। इसलिए तय है कि ग्राम, क्षेत्र और जिला पंचायतों में प्रशासकों का कार्यकाल फिर से बढ़ाया जाएगा।
इस मुद्दे पर पंचायत संगठन भी सक्रिय हो गया है। पंचायत संगठन के संयोजक जगत सिंह मर्तोलिया ने सरकार से मांग की है कि वह जल्द से जल्द पंचायत चुनावों की प्रक्रिया शुरू करे, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं सुचारू रूप से संचालित हो सकें। उनका कहना है कि प्रशासकों के माध्यम से पंचायतों का संचालन केवल एक अस्थायी समाधान है, जबकि जमीनी स्तर पर जनप्रतिनिधियों की आवश्यकता होती है, जो सीधे जनता के हितों को लेकर जवाबदेह होते हैं।
अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस दिशा में कितनी तेजी से कदम बढ़ाती है। पंचायत चुनावों की देरी न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है, बल्कि ग्राम्य विकास कार्यों पर भी असर डालती है। प्रशासकों के सीमित अधिकारों और राजनीतिक दिशा-निर्देशों के अभाव में कई विकास योजनाएं ठप्प पड़ी हैं।
इस सबके बीच ग्रामीण जनता को एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया के लंबा खिंचने का इंतजार करना पड़ सकता है। पंचायतों की आत्मनिर्भर और जवाबदेह व्यवस्था तभी संभव हो सकेगी, जब जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि जिम्मेदारी संभालें।

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