10 साल तक ₹7,000 वेतन पर शिक्षक? सुप्रीम कोर्ट ने कहा– यह बंधुआ मजदूरी के समान......
नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश सरकार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने निर्देश दिया कि वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए शिक्षकों को ₹17,000 प्रतिमाह की दर से मानदेय का भुगतान किया जाए, और बकाया राशि छह सप्ताह के भीतर दी जाए।
2013 के सरकारी आदेश से उपजा विवाद
हालांकि, बाद में 2017-18 में परियोजना अप्रूवल बोर्ड द्वारा मानदेय बढ़ाकर ₹17,000 प्रतिमाह कर दिया गया, लेकिन कुछ मामलों में इसे दोबारा घटाकर ₹7,000 कर दिया गया, जिस पर विवाद उत्पन्न हुआ।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति प्रशांत की पीठ ने कहा कि
“यदि मानदेय समय-समय पर पीढ़ी के विकास और महंगाई के अनुरूप नहीं बढ़ाया जाता, तो यह श्रमिकों के साथ अन्याय है।”
अदालत ने माना कि 2017-18 में नियुक्त सभी शिक्षक/अनुदेशक संशोधन लागू होने तक ₹17,000 प्रतिमाह मानदेय पाने के हकदार हैं।
उत्तराखंड के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला उत्तराखंड सरकार के लिए एक बड़ी सीख है, जहां आज भी कई
आउटसोर्स शिक्षक
संविदा/मानदेय आधारित कर्मी
कम वेतन और असुरक्षित सेवा शर्तों में वर्षों से कार्य कर रहे हैं।
यदि उत्तराखंड सरकार इस फैसले से सीख लेती है, तो यह न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगा बल्कि हजारों संविदा और आउटसोर्स शिक्षकों को न्याय दिलाने की दिशा में बड़ा कदम होगा।

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